दैन्य-माधुरी · पद 27
कहो हरि! हम तुम ते कछु थोर?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kaho hari! hama tumate kachhu thora?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहो हरि! हम तुम ते कछु थोर?।
2उत तव गुन अगनित इत देखिय, अवगुन अगनित मोर।
3उत तव लीला ते यम कंपित, इत लखि मम अघ घोर।
4तुम रसिकन सिरमोर इतै हम, विषयन रस सिरमोर।
5जब ते तुम तब ते हम तुम इक, हम हैं अमित करोर।
6तुम “कृपालु” हारहुगे मोते, संधि करहु न तु दोर॥
हिन्दी भावार्थ
हे भगवान्! हम तुम से किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं। उधर तुम्हारे पास अनंत गुणों का भण्डार है, तो इधर हमारे पास भी गुणों से ही उत्पन्न अगणित अवगुणों का भंडार है (गुणों से उत्पन्न का अभिप्राय है- सतोगुण, रजोगुण तमोगुणों से उत्पन्न)। उधर तुम्हारी अघटित-घटना-पटीयसी योगमायायुक्त लीला से यमराज काँपता है, तो इधर हमारे भी अगणित घोर पापों को देखकर यमराज भयभीत हो रहा है। उधर प्रेम रस-रसिकों के सिरमोर अनादिकाल से तुम हो और तभी से हम भी विषयी जनों के सिरमोर हैं इतना सब होते हुए भी एक बात में हम तुम से बढ़े हुए हैं, वह यह है कि तुम एक हो और हम असंख्य हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए तुम मुझसे अवश्य हार जाओगे। तुम्हारी भलाई इसी में है कि शीघ्रातिशीघ्र मुझसे संधि (मैत्री) कर लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 194-195