दैन्य-माधुरी · पद 26
कहाँ हरि! सोये हमरिहिं बार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahāṁ hari! soye hamarihiṁ bāra?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहाँ हरि! सोये हमरिहिं बार।
2पतित पुकार सुनत ही धावत, नेकु न लावत बार।
3कारण रहित कृपालु सदा ते, जानत तोहिं संसार।
4कैसेहुँ पतित शरण टुक आये, राखत चरण मझार।
5पतितन ही सों प्यार करत नित, अस कह संत पुकार।
6पुनि अति पतित “कृपालु” पेखि कत, उर निष्ठुरता धार॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! आज तक किसी भी पतित के आर्तनाद को सुनकर तुमने थोड़ी भी देर नहीं की, फिर आज हमारी ही बार कहाँ जाकर सो गये। सारा संसार तुम्हें बिना कारण के ही कृपा करने वाला अनादिकाल से जानता है। कैसा भी पतित तुम्हारी शरण में कभी आ जाय, उसे तुम सदा के लिए अपना बनाकर सर्वदा उसे अपने चरणों के पास ही रखते हो। रसिक जन पुकार-पुकार कर कहते हैं कि श्यामसुन्दर शरणागत पतितों से ही प्यार करते हैं। यदि यह सच है तो कृपालु' कहते हैं कि फिर मुझे, अत्यन्त पतित जानकर भी अपने हृदय को क्यों कठोर बना लिया है, मेरे ऊपर कृपा क्यों महीं करते?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 194