दैन्य-माधुरी · पद 25
कहाँ हरि! गई कृपा की बानि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahāṁ hari! gaī kṛipā kī bāni
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहाँ हरि! गई कृपा की बानि।
2निगमागम पुरान संतन तोहिं, कहत अहैतुक दानि।
3पुनि कत किंतु परंतु लगावत, साधन भजन बखानि।
4तुम कहँ सब कह सहज सनेही, कृपासिंधु सुखखानि।
5तुम कहँ कछु हम सब सों चाहिय, हौं न सकौं यह मानि।
6कह “कृपालु” साँची तबहूँ उर, नहिं प्रतीति यह जानि॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी अकारण-कृपा को बानि कहाँ चली गयी? वेद, शास्त्र, पुराण एवं संत तुमको बिना कारण के ही दान करने वाला बताते हैं, फिर तुम साधन भजन आदि का प्रतिपादन करते हुए शर्त क्यों लगाते हो। हे श्यामसुन्दर! तुमको सब लोग स्वभावतः प्रेम करने वाला, दया का सागर एवं आनंद की खान बताते हैं। यदि तुम कहो कि हम जो माँगते हैं वह तुम देते क्यों नहीं? तो इसका उत्तर सीधा सा है कि हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि तुम सरीखे चिदानंदमय स्वामी को हम सरीखे कूड़ा-कबाड़ा से कुछ चाहिए। 'कृपालु हैं कि बात तो तुम सच्ची कह रहे हो, किन्तु यदि सचमुच हृदय में यह विश्वास कर लो कि श्यामसुन्दर अहैतुक दानी एवं सहज सनेही हैं तो श्यामसुन्दर तुम्हें तत्काल निहाल कर दें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 193