# कहाँ हरि! गई कृपा की बानि।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0176-M04-K025
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 25
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 79–80

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कहाँ हरि! गई कृपा की बानि।  
<a id="line-2"></a>निगमागम पुरान संतन तोहिं, कहत अहैतुक दानि।  
<a id="line-3"></a>पुनि कत किंतु परंतु लगावत, साधन भजन बखानि।  
<a id="line-4"></a>तुम कहँ सब कह सहज सनेही, कृपासिंधु सुखखानि।  
<a id="line-5"></a>तुम कहँ कछु हम सब सों चाहिय, हौं न सकौं यह मानि।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” साँची तबहूँ उर, नहिं प्रतीति यह जानि॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी अकारण-कृपा को बानि कहाँ चली गयी? वेद, शास्त्र, पुराण एवं संत तुमको बिना कारण के ही दान करने वाला बताते हैं, फिर तुम साधन भजन आदि का प्रतिपादन करते हुए शर्त क्यों लगाते हो। हे श्यामसुन्दर! तुमको सब लोग स्वभावतः प्रेम करने वाला, दया का सागर एवं आनंद की खान बताते हैं। यदि तुम कहो कि हम जो माँगते हैं वह तुम देते क्यों नहीं? तो इसका उत्तर सीधा सा है कि हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि तुम सरीखे चिदानंदमय स्वामी को हम सरीखे कूड़ा-कबाड़ा से कुछ चाहिए। 'कृपालु हैं कि बात तो तुम सच्ची कह रहे हो, किन्तु यदि सचमुच हृदय में यह विश्वास कर लो कि श्यामसुन्दर अहैतुक दानी एवं सहज सनेही हैं तो श्यामसुन्दर तुम्हें तत्काल निहाल कर दें।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 193

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
