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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 24

कहाँ लौं कहिये हरि उपकार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahaṁ lauṁ, kahiye hari upakāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहाँ लौं कहिये हरि उपकार।

2जननि जठर दस मास राख जस, को तस राखन हार।

3पुनि जनमत ही जननि-दूध दिय, धन्य धन्य करतार।

4दूध गये पुनि दिये दशन पुनि, दिये अन्न बलिहार।

5पुनि छिन छिन कर्मन को लेखा, राख्यो सबहिं सँभार।

6पुनि “कृपालु” दिय पूर्व कर्म फल, जड़ न मान आभार॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे उपकारों को कहाँ तक गिनाऊँ। तुमने माँ के पेट में दस महीने जिस प्रकार मुझे पाला-पोसा उस प्रकार संसार में कौन कर सकता है? फिर पैदा होते ही स्वभावतः माँ के स्तनों से दूध गिरने लगा। बलिहारी है करतार म्हारी विलक्षण करतूत को! प्राप्त हुआ अपने आप दाँत निकल आये, और फिर तुमने भोजन का भी प्रबन्ध कर दिया। मौकों का लेखा जोखा भी संभाल कर रखा। 'कृपालु' कहते. का लेखा-जोखा भी सँभाल कर रखा हैं कि फिर तुमने बिना हमारे माँगे ही हमारे पूर्व-कर्मौकों का फल दिया। किन्तु मैं ऐसा निकृष्ट हूँ, जो फिर भी तुम्हारा आभार नहीं मानता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 192-193