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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 23

कहत प्रभु! छोटे मुहँ बड़ि बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahata prabhu! chhoṭe muṁha bad̤i bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहत प्रभु! छोटे मुहँ बड़ि बात।

2निज जन जानि सुनिय नँदनंदन, बुरो न मानिय तात।

3जननि पयोधर पय रस ज्यों शिशु, नहिं जानत नवजात।

4यह जिय जानि डारि कुच शिशु मुख, पय पिवाय सब मात।

5त्यों हौं पियत अनादि काल ते, विषयन-रस मदमात।

6जान “कृपालु” न प्रेम सुधारस, टुक पिवाय बलभ्रात॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! हम तुमसे छोटे मुँह बड़ी बात करने जा रहे हैं। किन्तु अपना-जन जानकर ध्यान से सुनो। भैया! बुरा न मान जाना। तुरन्त का पैदा हुआ बच्चा अपनी माता के स्तन एवं स्तनजन्य दूध को भी नहीं जानता। उसकी इस अज्ञानता को माताएँ जान कर अपने स्तन को बच्चे के मुँह में डालकर थोड़ा सा दूध चुआ देती हैं। उसी प्रकार हे श्यामसुन्दर! मैं भी अनादिकाल से विषय-विष का ही पान करता आया हूँ। कृपालु' कहते हैं तुम्हारे दिव्य प्रेमामृत के रस से सर्वथा अपरिचित हूँ एवं आशा करता हूँ कि सांसारिक माता की तरह तुम भी मुझे थोड़ा सा प्रेम-रस पिला दोगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 191-192