# कहो हरि! हम तुम ते कछु थोर?।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0178-M04-K027
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 27
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 80–80

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कहो हरि! हम तुम ते कछु थोर?।  
<a id="line-2"></a>उत तव गुन अगनित इत देखिय, अवगुन अगनित मोर।  
<a id="line-3"></a>उत तव लीला ते यम कंपित, इत लखि मम अघ घोर।  
<a id="line-4"></a>तुम रसिकन सिरमोर इतै हम, विषयन रस सिरमोर।  
<a id="line-5"></a>जब ते तुम तब ते हम तुम इक, हम हैं अमित करोर।  
<a id="line-6"></a>तुम “कृपालु” हारहुगे मोते, संधि करहु न तु दोर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे भगवान्! हम तुम से किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं। उधर तुम्हारे पास अनंत गुणों का भण्डार है, तो इधर हमारे पास भी गुणों से ही उत्पन्न अगणित अवगुणों का भंडार है (गुणों से उत्पन्न का अभिप्राय है- सतोगुण, रजोगुण तमोगुणों से उत्पन्न)। उधर तुम्हारी अघटित-घटना-पटीयसी योगमायायुक्त लीला से यमराज काँपता है, तो इधर हमारे भी अगणित घोर पापों को देखकर यमराज भयभीत हो रहा है। उधर प्रेम रस-रसिकों के सिरमोर अनादिकाल से तुम हो और तभी से हम भी विषयी जनों के सिरमोर हैं इतना सब होते हुए भी एक बात में हम तुम से बढ़े हुए हैं, वह यह है कि तुम एक हो और हम असंख्य हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए तुम मुझसे अवश्य हार जाओगे। तुम्हारी भलाई इसी में है कि शीघ्रातिशीघ्र मुझसे संधि (मैत्री) कर लो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 194-195

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
