दैन्य-माधुरी · पद 18
आजु हौं करिहौं हरि! झगड़ो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju hauṁ karihauṁ hari! jhagad̤o
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु हौं करिहौं हरि! झगड़ो।
2अब लौं नहिं कछु कह्यों जानि हौं, तोहिं भगवान बड़ो।
3तुम मम राजा स्वामि सखा सुत, पति, यह जानि अड़ो।
4नातो पाँच साँच तोहिं याते, चाहत आजु लड़ो।
5एकहिं नात मान जग, तुम्हरो, केतिक हृदय कड़ो।
6हौं “कृपालु” सत्याग्रह करिहौं, तुम्हरे द्वार पड़ो॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! आज मैं तुमसे झगड़ा करूँगा। अब तक मैंने तुम्हें पूज्य भगवान् समझ कर कुछ नहीं कहा, किन्तु रसिकों के द्वारा यह जान लेने पर कि तुम मेरे राजा हो, स्वामी हो, सखा हो, पुत्र हो, प्रियतम हो, लड़ने आया हूँ। तुमसे हमारे पाँच नाते हैं; संसार में संसारी लोग एक ही नाते को आजीवन निभाते हैं किन्तु तुम्हारा हृदय कितना कड़ा है जो मुझसे अनादि काल से उदासीन हो। 'कृपालु' कहते हैं अब मैं तुम्हारे द्वार पर धरना देकर सत्याग्रह करूँगा। सत्याग्रह से अभिप्राय है दीनतापूर्वक करुण-क्रन्दन।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 188