# आजु हौं करिहौं हरि! झगड़ो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0169-M04-K018
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 18
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 77–77

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु हौं करिहौं हरि! झगड़ो।  
<a id="line-2"></a>अब लौं नहिं कछु कह्यों जानि हौं, तोहिं भगवान बड़ो।  
<a id="line-3"></a>तुम मम राजा स्वामि सखा सुत, पति, यह जानि अड़ो।  
<a id="line-4"></a>नातो पाँच साँच तोहिं याते, चाहत आजु लड़ो।  
<a id="line-5"></a>एकहिं नात मान जग, तुम्हरो, केतिक हृदय कड़ो।  
<a id="line-6"></a>हौं “कृपालु” सत्याग्रह करिहौं, तुम्हरे द्वार पड़ो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! आज मैं तुमसे झगड़ा करूँगा। अब तक मैंने तुम्हें पूज्य भगवान् समझ कर कुछ नहीं कहा, किन्तु रसिकों के द्वारा यह जान लेने पर कि तुम मेरे राजा हो, स्वामी हो, सखा हो, पुत्र हो, प्रियतम हो, लड़ने आया हूँ। तुमसे हमारे पाँच नाते हैं; संसार में संसारी लोग एक ही नाते को आजीवन निभाते हैं किन्तु तुम्हारा हृदय कितना कड़ा है जो मुझसे अनादि काल से उदासीन हो। 'कृपालु' कहते हैं अब मैं तुम्हारे द्वार पर धरना देकर सत्याग्रह करूँगा। सत्याग्रह से अभिप्राय है दीनतापूर्वक करुण-क्रन्दन।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 188

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
