दैन्य-माधुरी · पद 17
आजु हरि दैहौं जो तोहिं भाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju hari daihauṁ jo tohiṁ bhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु हरि दैहौं जो तोहिं भाय।
2पांच पूतना इंद्रिन विषयन, विष पी जाइय आय।
3मारि अघासुर अघन अनंतन, जीव सखहिं हरषाय।
4मारि बकासुर रूप दंभ मम, जो छल-ध्यान लगाय।
5उर दावानल रूप त्रितापहिं, आय पियहु बलभाय।
6इमि “कृपालु” उर ब्रज असुरन वधि, नित नव रास रचाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम्हें जो अत्यन्त प्रिय है, आज मैं वही देने आया हूँ तुमको पूतना के कुचाग्र भाग का विष बहुत प्रिय है। मैं तुम्हें पाँच ज्ञानेन्द्रियों के अग्रस्थ विषय-विष को सहर्ष दे रहा हूँ, आकर पी जाओ। तुम्हें अघासुर का वध बहुत प्रिय है, उसे मार कर तुमने अपने सखाओं को सुखी किया था मेरे पास भी अनन्त अघ अर्थात् पाप हैं, इन्हें मार कर वेद वर्णित अपने सखा जीव को सुखी करो। तुम्हें बकासुर का वध भी बहुत प्रिय है, मेरे पास भी बकासुर के ही समान अनन्त पाखण्ड के स्वरूप हैं जिनके कारण हम आपका कपटमय रूपध्यान करते हैं, उनको मारकर मुझे कृतार्थ कौजिए। आपको दावानल पान भी अत्यन्त प्रिय है। मेरे पास तो दैहिक, दैविक भौतिक तीन प्रकार के अनल है, इनको आकर पी जाइये। कृपालु' कहते हैं जिस प्रकार उपर्युक्त बाधाओं को दूर करके ब्रज में जीवों को महारास का सुख दिया था, उसी प्रकार हमारे हृदयस्थ दोषों को भी निर्मूल नष्ट करके नित्य-नवीन रस का पान कराइये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 187-188