# आजु हरि दैहौं जो तोहिं भाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0168-M04-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 76–76

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु हरि दैहौं जो तोहिं भाय।  
<a id="line-2"></a>पांच पूतना इंद्रिन विषयन, विष पी जाइय आय।  
<a id="line-3"></a>मारि अघासुर अघन अनंतन, जीव सखहिं हरषाय।  
<a id="line-4"></a>मारि बकासुर रूप दंभ मम, जो छल-ध्यान लगाय।  
<a id="line-5"></a>उर दावानल रूप त्रितापहिं, आय पियहु बलभाय।  
<a id="line-6"></a>इमि “कृपालु” उर ब्रज असुरन वधि, नित नव रास रचाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हें जो अत्यन्त प्रिय है, आज मैं वही देने आया हूँ तुमको पूतना के कुचाग्र भाग का विष बहुत प्रिय है। मैं तुम्हें पाँच ज्ञानेन्द्रियों के अग्रस्थ विषय-विष को सहर्ष दे रहा हूँ, आकर पी जाओ। तुम्हें अघासुर का वध बहुत प्रिय है, उसे मार कर तुमने अपने सखाओं को सुखी किया था मेरे पास भी अनन्त अघ अर्थात् पाप हैं, इन्हें मार कर वेद वर्णित अपने सखा जीव को सुखी करो। तुम्हें बकासुर का वध भी बहुत प्रिय है, मेरे पास भी बकासुर के ही समान अनन्त पाखण्ड के स्वरूप हैं जिनके कारण हम आपका कपटमय रूपध्यान करते हैं, उनको मारकर मुझे कृतार्थ कौजिए। आपको दावानल पान भी अत्यन्त प्रिय है। मेरे पास तो दैहिक, दैविक भौतिक तीन प्रकार के अनल है, इनको आकर पी जाइये। कृपालु' कहते हैं जिस प्रकार उपर्युक्त बाधाओं को दूर करके ब्रज में जीवों को महारास का सुख दिया था, उसी प्रकार हमारे हृदयस्थ दोषों को भी निर्मूल नष्ट करके नित्य-नवीन रस का पान कराइये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 187-188

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
