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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 19

कबहुँ सखि हमहुँ देखिहौं श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kabahuṁ sakhi hamahuṁ dekhihauṁ shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कबहुँ सखि हमहुँ देखिहौं श्याम।

2बहुत दिनन ते गुनन सुनति हौं, कोटि काम अभिराम।

3अंग अंग जनु चुवत सुधारस, अस कह सब ब्रजबाम।

4इक तो सुनति चपल चितवनि ते, बिके सबै बिनु दाम।

5दूजो सुनति मधुर मृदु मुसुकनि, होत सबै बेकाम।

6कह “कृपालु” इक और मुरलिधुनि, घायल कर अविराम॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! श्यामसुन्दर को कभी मैं भी देखूँगी? कभी ऐसा सौभाग्य हमारा भी होगा? गुणों को सुन रही हूँ कि वे करोड़ों कामदेवों से अधिक सुन्दर हैं। उनके अंग-अंग से मानो अमृत रस चूता रहता है, ऐसा समस्त ब्रजांगनाएं कहती हैं। चंचल नेत्र की चितवनि में विलक्षण जादू है जिससे सब बिना दाम के बिक जाते हैं। मुस्कान से सब विह्वल हो जाते हैं। अरी सखि! एक और भी बात है, उनकी मुरली की धुनि से तो कोई भी नहीं बच पाता, वह निरन्तर सबको घायल करती रहती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 188-189