दैन्य-माधुरी · पद 20
कबै हरि बनिहौं ब्रज को मोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kabai hari banihauṁ braja ko mora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कबै हरि बनिहौं ब्रज को मोर।
2लखि घनश्याम जानि घनश्यामहिं, ह्वैहौं प्रेम विभोर।
3प्रेम विभोर होत ही नचिहौं, झुकि झुकि पंख मरोर।
4नाचत पंख मरोर मोर मन, उठिहैं सरस हिलोर।
5उठत हिलोर"श्याम"! इमि कहि कहि, शोर मचैहौं घोर।
6मोर मुकुट हित हौं “कृपालु” नित, दैहौं पंखन तोर॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मैं तुम्हारे ब्रजधाम में मोर कब बनूगा? मोर बनकर काले बादलों के समान तुमको सचमुच ही काला बादल समझ कर कब प्रेम-विभोर होऊँगा? प्रेम विभोर होकर कब झुक-झुक कर अपने पंखों को मरोड़ मरोड़ कर नाचूँगा? पंख मरोड़ कर नाचते हुए मेरे मन में कब मधुर हिलोरें उठेंगी? हिलोर उठने पर मैं कब 'श्याम''श्याम ऐसा कह-कहकर घनघोर शोर मचाऊँगा? 'कृपालु' कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मैं तुम्हारे मोर-मुकुट के हेतु नित्य अपने पंख तोड़ कर दिया करूँगा?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 189-190