दैन्य-माधुरी · पद 21
करिय पिय मोहिं भँवरा ब्रज माहिं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kariya piya! mohiṁ bhaṁvarā braja māhiṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करिय पिय मोहिं भँवरा ब्रज माहिं।
2गुन गुन गुन गुन गुनगन गावत, सेवाकुंज सिराहिं।
3पी पराग वनमाल लाल को, ह्वै मदमत्त भ्रमाहिं।
4गुंजन करत कुंज पुंजन हम, प्रिया मनावन जाहिं।
5मानिनि को संदेश सुनावत, उर आनंद न समाहिं।
6लहि “कृपालु” रस-युगल माधुरी, मदिरा-मद बौराहिं॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! दीजिये अपनी भाषा में गुन-गुन-गुन-गुन करते हुए, एवं आपके गुणों को गाते हुए सेवाकुंज में हमारा जीवन व्यतीत हो। श्यामसुन्दर! तुम्हारी वनमाला के पुष्पराग का पान करके मतवाला होकर मैं चारों ओर घूमूँ। करते हुए मैं मानिनी राधिका जी को मजाने जाऊँ, एवं मानिनी राधिका जी का संदेश तुमको सुनाते हुए आनन्द में विभोर हो जाऊँ। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार युगल-सरकार के मधुर प्रेम रस का पान करके, उस मदिरा के मद में पागल हो जाऊँ!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 190