सिद्धान्त-माधुरी · पद 134
हमारे, मन भायो ब्रजधाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāre, mana bhāyo brajadhāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारे, मन भायो ब्रजधाम।
2जहँ ज्ञानिन-आराध्य मुक्ति हूँ, निशिदिन रहति गुलाम।
3पानी भरति बनी पनिहारिनि, निदरतहूँ ब्रजभाम।
4गहवरवन निधिवन वृंदावन, लतन-कुंज अभिराम।
5नाम रूप लीला गुन गावत, भावत श्यामा श्याम।
6तृण सम लखत “कृपालु” त्रिलोकहुँ, अरु बैकुण्ठ ललाम॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं। गह्वर वन, वृन्दावन निधिवन आदि में जहाँ सुन्दर लताओं के कुंज हैं वहीं पर र श्याम के नाम, रूप लीला, गुण को गाते हुए सुख पाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम इस सुख के आगे त्रैलोक्य तो क्या बैकुण्ठ के सुख को भी तृण के समान देखते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 166