लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 133

हमारे मन भाई भानुलली।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāre mana bhāīṁ bhānu-lalī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारे मन भाई भानुलली।

2भरी गुमान दिवानी डोलति, जानत जग पगली।

3लोक-वेद-कुल कानि तजी सब, लोग कहें विटली।

4कर्म अकर्म विकर्म आदि की, विपदा आपु टली।

5राधे नाम सरस-रस चाखत, अमृत मधुर डली।

6विहरति नित “कृपालु” स्वामिनि सँग, गहवर-कुंजगली॥

हिन्दी भावार्थ

मेरे मन को श्री वृषभानुनंदिनी किशोरी जी ही अच्छी लगती हैं। "वे हमारी स्वामिनी हैं'मैं इसी अभिमान में सदा दीवानी रहती हूँ। संसार मुझे पगली समझता है। मैंने लोक वेद एवं वंश की मर्यादा का सर्वथा त्याग कर दिया है। संसार के लोग मुझे भ्रष्ट कहते हैं। कर्म, अकर्म (कर्म न करना) विकर्म (विपरीत कर्म करना), इत्यादि की आपत्ति अपने राधे नाम के रस क मैं सदा ही पिया करती हूँ.। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं निरन्तर ही स्वामिनी जी के साथ गहवर वन की कुंज गलियों में विविध प्रकार के रसविलास का रसास्वादन किया करती हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 165-166