सिद्धान्त-माधुरी · पद 132
हम भूखे ब्रज की गारी के।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama bhūkhe braja kī gārī ke
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हम भूखे ब्रज की गारी के।
2वारत निज बैकुण्ठ लोक-सुख, सुनि सुनि गारी"दारी के"।
3भाव न मो कहँ नेकहुँ अस्तुति, महावाक्य श्रुति चारी के।
4होत विभोर सुनत ब्रजनारिन, वाक्यन चोरी जारी के।
5भाव न मो कहँ चरण समर्चन, पद्मा सी घरवारी के।
6मोहिं “कृपालु” तो चरण पलोटन, भावत भानुदुलारी के॥
हिन्दी भावार्थ
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। दारी के'इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ। मुझे चारों वेदों के महावाक्यों द्वारा की हुई स्तुति किंचित भी अच्छी नहीं लगती। किन्तु ब्रजांगनाओं के प्यार भरे "चोरी जारी के'वाक्यों को सुनकर आनन्द विभोर हो जाता हूँ। मुझे महालक्ष्मी सरीखी अर्धांगिनी के द्वारा की हुई चरण पूजा नहीं अच्छी लगती। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो वृषभानुनन्दिनी के चरणों को दबाने में ही अपना सौभाग्य समझता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 164-165