# हम भूखे ब्रज की गारी के।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0141-M03-K132
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 132
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 64–64

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हम भूखे ब्रज की गारी के।  
<a id="line-2"></a>वारत निज बैकुण्ठ लोक-सुख, सुनि सुनि गारी"दारी के"।  
<a id="line-3"></a>भाव न मो कहँ नेकहुँ अस्तुति, महावाक्य श्रुति चारी के।  
<a id="line-4"></a>होत विभोर सुनत ब्रजनारिन, वाक्यन चोरी जारी के।  
<a id="line-5"></a>भाव न मो कहँ चरण समर्चन, पद्मा सी घरवारी के।  
<a id="line-6"></a>मोहिं “कृपालु” तो चरण पलोटन, भावत भानुदुलारी के॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। दारी के'इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ। मुझे चारों वेदों के महावाक्यों द्वारा की हुई स्तुति किंचित भी अच्छी नहीं लगती। किन्तु ब्रजांगनाओं के प्यार भरे "चोरी जारी के'वाक्यों को सुनकर आनन्द विभोर हो जाता हूँ। मुझे महालक्ष्मी सरीखी अर्धांगिनी के द्वारा की हुई चरण पूजा नहीं अच्छी लगती। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो वृषभानुनन्दिनी के चरणों को दबाने में ही अपना सौभाग्य समझता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 164-165

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
