सिद्धान्त-माधुरी · पद 135
हमें तो अली लली सोँ काम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hameṁ to, alī! lalī soṁ kāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमें तो अली लली सोँ काम।
2रसिक रँगीली गुन गर्वीली, छैल छबीली भाम।
3पूरनकाम श्यामहुँ जाको, आठों याम गुलाम।
4गहवर गली भली अलि मो कहँ, नहिं बैकुण्ठ ललाम।
5मन भावत नित आवत जावत, गावत राधे नाम।
6मंजुल कुंज “कृपालु” निकुंजनि, विचरति आठों याम॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! मुझे तो एकमात्र किशोरी जी से ही काम है। जो रसिकों को रिझाने वाली, गुणों की खान एवं रूप रस की सीमा हैं। पूर्णकाम श्यामसुन्दर भी जिनकी दिन-रात चाकरी करते हैं। मुझे बैकुण्ठ नहीं चाहिये। मेरे लिये तो गह्वर र की गलियाँ ही अच्छी हैं। आते-जाते हुए, राधे नाम गाते हुए सदा आनन्द विभोर रहता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो सुन्दर लता कुंजों में ही दिन-रात विचरण करता रहता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 166-167