# हमारे, मन भायो ब्रजधाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0143-M03-K134
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 134
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 65–65

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारे, मन भायो ब्रजधाम।  
<a id="line-2"></a>जहँ ज्ञानिन-आराध्य मुक्ति हूँ, निशिदिन रहति गुलाम।  
<a id="line-3"></a>पानी भरति बनी पनिहारिनि, निदरतहूँ ब्रजभाम।  
<a id="line-4"></a>गहवरवन निधिवन वृंदावन, लतन-कुंज अभिराम।  
<a id="line-5"></a>नाम रूप लीला गुन गावत, भावत श्यामा श्याम।  
<a id="line-6"></a>तृण सम लखत “कृपालु” त्रिलोकहुँ, अरु बैकुण्ठ ललाम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारे मन को तो एकमात्र ब्रजधाम ही अच्छा लगता है। जहाँ ज्ञानियों की आराध्या देवी मुक्ति भी सदा दासता करती है। चारों मुक्ति ब्रजांगनाओं के अपमान करने पर भी पनिहारिन बनकर जहाँ पानी भरा करती हैं। गह्वर वन, वृन्दावन निधिवन आदि में जहाँ सुन्दर लताओं के कुंज हैं वहीं पर र श्याम के नाम, रूप लीला, गुण को गाते हुए सुख पाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम इस सुख के आगे त्रैलोक्य तो क्या बैकुण्ठ के सुख को भी तृण के समान देखते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 166

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
