सिद्धान्त-माधुरी · पद 129
सोच मन! श्याम मिलन की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: socha mana! shyāma milana kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सोच मन! श्याम मिलन की बात।
2यह जग है इक गोरखधंधा, कहा याय पतियात।
3जेहि यम किंकर अस दसकंठहुँ, माटी महँ मिलि जात।
4परम स्वारथिन सों नित जोरत, तिय सुत पति पितु नात।
5जो बिनु स्वारथ पर-उपकारी, लोक वेद विख्यात।
6भजत न तेहि “कृपालु” मन मूरख, सुंदर श्यामल गात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! अब तो श्यामसुन्दर के मिलन की बात सोच। यह संसार तो गोरखधंधे के समान परिणाम में परिश्रम ही देगा। इसका क्या विश्वास करता है। जिसका यमराज भी क नए कप ड नौकर था ऐसा रावण भी मिट्टी में मिल गया। महान् स्वार्थी स्त्री पुत्र, पति, पितादि से तू प्रेम करता है। किन्तु जो बिना स्वार्थ के ही दूसरों का उपकार करने वाले हैं ऐसा जिन्हें लोक, वेद सब जानते हैं 'कृपालु' कहते हैं अरे मन! उन श्यामसुन्दर से प्रेम क्यों नहीं करता। यह तेरी कितनी बड़ी भूल है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 162-163