# सोच मन! श्याम मिलन की बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0138-M03-K129
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 129
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 63–63

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सोच मन! श्याम मिलन की बात।  
<a id="line-2"></a>यह जग है इक गोरखधंधा, कहा याय पतियात।  
<a id="line-3"></a>जेहि यम किंकर अस दसकंठहुँ, माटी महँ मिलि जात।  
<a id="line-4"></a>परम स्वारथिन सों नित जोरत, तिय सुत पति पितु नात।  
<a id="line-5"></a>जो बिनु स्वारथ पर-उपकारी, लोक वेद विख्यात।  
<a id="line-6"></a>भजत न तेहि “कृपालु” मन मूरख, सुंदर श्यामल गात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! अब तो श्यामसुन्दर के मिलन की बात सोच। यह संसार तो गोरखधंधे के समान परिणाम में परिश्रम ही देगा। इसका क्या विश्वास करता है। जिसका यमराज भी क नए कप ड नौकर था ऐसा रावण भी मिट्टी में मिल गया। महान् स्वार्थी स्त्री पुत्र, पति, पितादि से तू प्रेम करता है। किन्तु जो बिना स्वार्थ के ही दूसरों का उपकार करने वाले हैं ऐसा जिन्हें लोक, वेद सब जानते हैं 'कृपालु' कहते हैं अरे मन! उन श्यामसुन्दर से प्रेम क्यों नहीं करता। यह तेरी कितनी बड़ी भूल है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 162-163

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
