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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 128

सुनो हरि! खरी खरी अब बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno hari! kharī kharī aba bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो हरि! खरी खरी अब बात।

2हौं तो मायाधीन सनातन, वेद विदित विख्यात।

3पै तुम मायाधीश कहावत, पुनि काहे डरपात।

4तुम्हरे सुतहिं मार तव दासी, छिन-छिन जूते लात।

5बने अकारण करुण देख सब, पै कछु करि न सकात।

6"यमेवैष वृणुते"इति श्रुति की, बात तिहारी जात।

7पांचहुँ मुक्ति “कृपालु” न याचत, याचत तुम सँग नात॥

हिन्दी भावार्थ

हे नाथ! आज तुम्हें मैं कुछ खरी-खरी सुनाने आया हूँ। मैं तो सदा से मायाधीन हूँ, यह लोक, वेद में विख्यात है किन्तु तुम माया के स्वामी होकर भी माया से डरते हो। इसका प्रमाण यह है कि तुम्हारे पुत्र स्वरूप जीवों को तुम्हारी दासी सरीखी माया अनेक प्रकार के कष्ट दे रही है और तुम अकारण करुण की उपाधि लिए हुए सब देख रहे हो, कुछ कर नहीं सकते। "जिस पर भगवान् कृपा करता है वही भगवान् को पा सकता है'यह वेद वाणी मिथ्या सिद्ध हुई जा रही है। कृपालु कहते हैं कि हम पाँचों प्रकार की मुक्ति नहीं माँगते, केवल तुम्हारा प्रेम ही मांगते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 161-162