सिद्धान्त-माधुरी · पद 130
हम चाकर उन ब्रज नारिनि के।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama chākara una braja nārini ke
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हम चाकर उन ब्रज नारिनि के।
2भूखे रहत ब्रह्म खायेहु पै, जिन ब्रजनारिन गारिनि के।
3थेइ थेइ करि नित नाचत गावत, जिनकी तारन तारिनि के।
4घर घर फिरत सुनन कटु वचनन, जिनकी चोरिनि जारिनि के।
5याचत चरण रेणु ब्रह्मादिक, जिन ब्रज की पनिहारिनि के।
6धनि “कृपालु” ब्रजनारिन जिन नित, विहरति संग विहारिनि के॥
हिन्दी भावार्थ
हम इन ब्रजांगनाओं के दास हैं, जिनकी सदा गाली खाने पर भी ब्रह्म श्यामसुन्दर भूखे ही बने रहते हैं। हाथ की तालियों की ताल पर श्यामसुन्दर थेइ-थेइ करते हुए नाचते हैं। जिनके चोरी जारी के कडवे वचनों को सुनने के लिए श्यामसुन्दर बरबस उनके घरों में जाते हैं। चरणधूलि देवाधिदेव ब्रह्मादिक भी चाहते हैं 'कृपालु' कहते हैं कि वे ब्रजांगनाएँ धन्य हैं जो स्वामिनी कुंज-विहारिणि के साथ विहार करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 163