सिद्धान्त-माधुरी · पद 125
सुनो मन! सुख दुख नहिं संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! sukha dukha nahiṁ sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो मन! सुख दुख नहिं संसार।
2सुख वादी कर प्यार जगत सों, दुखवादी कर खार।
3जो सुख होत जगत तो कोउ तो, पावत करिय विचार।
4जो दुख होत रहत कत संतन, सदा सुखी इकसार।
5जोइ असीम सोइ सुख जोइ सीमित, सोइ दुख यह उर धार।
6कह “कृपालु” मन सुन सुख पर कहुँ, होत न दुख अधिकार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! सुन, संसार में सुख एवं दुःख दोनों ही नहीं हैं। संसार में सुख मानने वाले संसार से ही प्यार करते हैं क्योंकि सुख प्राप्ति जीव का स्वाभाविक स्वभाव है। और इसी कारण संसार में दुःख मानने वालों को संसार से शत्रुता हो जाती है, क्योंकि वह आत्मा के स्वभाव के विपरीत है। अर्थात् कोई भी जीवात्मा दुःख से प्यार नहीं करती! अरे मन! यदि संसार में कहीं सुख होता तो कभी तो किसी को तो प्राप्त हुआ होता? इसी प्रकार संसार में दुःख होता तो परमानन्द प्राप्त संतों को भी कहीं तो कभी तो दुःख मिलता? अतएव संसार में न सुख है न दुःख है। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि जो अनन्त मात्रा का होता है वही सुख है। संसार का सुख सीमित है अतएव वह सुख हो ही नहीं सकता। कृपालु' कहते हैं, अरे मन!! एक बात और है, वह यह कि सुख के ऊपर दुःख का अधिकार कभी भी, कथमपि नहीं हो सकता। इसलिये सिद्ध हुआ कि संसार में सुख तथा दुःख दोनों ही नहीं हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 159-160