# सुनो मन! सुख दुख नहिं संसार।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0134-m03-k125/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0134-M03-K125
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 125
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 61–61

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0134-m03-k125/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=134&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0134-m03-k125.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनो मन! सुख दुख नहिं संसार।  
<a id="line-2"></a>सुख वादी कर प्यार जगत सों, दुखवादी कर खार।  
<a id="line-3"></a>जो सुख होत जगत तो कोउ तो, पावत करिय विचार।  
<a id="line-4"></a>जो दुख होत रहत कत संतन, सदा सुखी इकसार।  
<a id="line-5"></a>जोइ असीम सोइ सुख जोइ सीमित, सोइ दुख यह उर धार।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” मन सुन सुख पर कहुँ, होत न दुख अधिकार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! सुन, संसार में सुख एवं दुःख दोनों ही नहीं हैं। संसार में सुख मानने वाले संसार से ही प्यार करते हैं क्योंकि सुख प्राप्ति जीव का स्वाभाविक स्वभाव है। और इसी कारण संसार में दुःख मानने वालों को संसार से शत्रुता हो जाती है, क्योंकि वह आत्मा के स्वभाव के विपरीत है। अर्थात् कोई भी जीवात्मा दुःख से प्यार नहीं करती! अरे मन! यदि संसार में कहीं सुख होता तो कभी तो किसी को तो प्राप्त हुआ होता? इसी प्रकार संसार में दुःख होता तो परमानन्द प्राप्त संतों को भी कहीं तो कभी तो दुःख मिलता? अतएव संसार में न सुख है न दुःख है। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि जो अनन्त मात्रा का होता है वही सुख है। संसार का सुख सीमित है अतएव वह सुख हो ही नहीं सकता। कृपालु' कहते हैं, अरे मन!! एक बात और है, वह यह कि सुख के ऊपर दुःख का अधिकार कभी भी, कथमपि नहीं हो सकता। इसलिये सिद्ध हुआ कि संसार में सुख तथा दुःख दोनों ही नहीं हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 159-160

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0133-m03-k124/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0135-m03-k126/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
