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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 126

सुनो सब एक अनसुनी बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno saba eka anasunī bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो सब एक अनसुनी बात।

2सब कह साधन भजन करहु तब, कृपा करत बलभ्रात।

3हौं कह साधन बिनुहिं कृपा कर, सुंदर श्यामल गात।

4जब लौं शिशु नहिं कछु कर तब लौं, सब कछु कर जग-मात।

5जब शिशु कछु कछु कर तब जननिहुँ, कछु कछु करत जनात।

6जब शिशु सब कछु कर तब जननी, नहिं कछु करत लखात।

7करि विश्वास शरण गहु पूरण, श्याम-चरण जलजात।

8करत “कृपालु” वहन सब गिरिधर, योगक्षेम दिनरात॥

हिन्दी भावार्थ

एक तत्त्वज्ञ कहता है-एक आश्चर्यजनक बात सुनो। शास्त्र, वेद एवं महात्मा लोग कहते हैं कि साधन-भजन करने पे श्यामसुन्दर कृपा करते हैं, किन्तु मैं कहता हूँ कि श्यामसुन्दर बिना साधन के ही कृपा करते हैं। हीं करता अर्थात् पूर्ण शरणागत रहता है तब तक उसकी माँ पब कुछ करती है। ब माँ भी कुछ-कुछ करती दिखाई पड़ती है। पब-कुछ करने लगता है तब माँ कुछ भी नहीं करती। प्रकार जब कोई जीव विश्श्वासपूर्वक श्यामसुन्दर के शरणागत हो जाता है, 'कृपालु' कहते हैं तब श्यामसुन्दर उसके योग क्षेम को दिन-रात स्वयं वहन करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 160-161