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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 124

सुनो मन! सबै श्रुतिन को सार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! sabai shrutina ko sāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो मन! सबै श्रुतिन को सार।

2इक माया इक जीव दुहुँन को, ईश ब्रह्म साकार।

3मायाधीन सनातन जीवहिं, माया ही सों प्यार।

4जीव ब्रह्म को दिव्य अंश है, चारिहुँ वेद पुकार।

5याते याको विषय न मायिक, यह मायिक संसार।

6मायिक जग सों राग द्वेष तजि, रहु गुरु-शरण मझार।

7तजहु “कृपालु” अपर साधन बल, भजहु युगल सरकार॥

हिन्दी भावार्थ

हे मन! समस्त वेदों का सार सुनो। ईश्वर तीन ही तत्त्व हैं इनमें ईश्वर ही माया एवं जीव का शासक है। यह जीव अनादि काल से मायाबद्ध है और माया के क्षेत्र में ही प्यार कर रहा है किन्तु यदि यह रहस्य समझ में आ जाय कि जीव तो ईश्वर का अंश है और दिव्य है अतः मायिक जगत् इसका विषय ही नहीं है तो इस संसार से राग द्वेष रहित होकर वास्तविक महापुरुष को शरणागति में रहकर राधा-कृष्ण की भक्ति द्वारा कृतार्थ हो जायेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन! अब तू सब साधनों का बल त्यागकर श्यामा-श्याम का भजन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 158-159