सिद्धान्त-माधुरी · पद 123
सुनो मन! श्रुति सिद्धांत विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! shruti siddhānta vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो मन! श्रुति सिद्धांत विचार।
2"यस्यामतं तस्य मतमिति"श्रुति, भाव इहै उर धार।
3जानि न सकै ब्रह्म को बुधिबल, विधि हरि हर गये हार।
4ताते तजि कुतर्क संशय सब, शरण जाहु हरि द्वार।
5रूपध्यान करि कांत भाव सोँ, भजु नित नंदकुमार।
6तब “कृपालु” हो कृपा जासु फल, पाउ प्रेम रस सार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! वेदों का वास्तविक सिद्धान्त सुन! यस्यामतं 'इस वेदवाणी का यही भाव है कि भगवान् को बुद्धि के बल से कोई भी नहीं जान सकता। ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर तक हार चुके, इसलिये सभी कुतर्क एवं शंकाओं को छोड़कर भगवान् की शरण जाओ। रूपध्यान करते हुए कांत भाव से भगवान् का निरन्तर भजन करो। 'कृपालु' कहते हैं कि तब उनको कृपा होगी जिसके परिणाम स्वरूप विशुद्ध प्रेम प्राप्त हो सकेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 158