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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 122

सुनो मन! यह स्वरूप संसार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! yaha swarūpa sansāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो मन! यह स्वरूप संसार।

2शब्द स्पर्श रूप रस गंधहिं, पंच विषय उर धार।

3तू माँगत इनहिंन कहँ पै कछु, मरम न जान गमार।

4जो होवति तव पूर्ण कामना, प्रकटत लोभ अपार।

5जो न होति तव पूर्ण कामना, प्रकटत क्रोध निहार।

6दुहुँन “कृपालु” भांति दुख दारुन, भज मन नंदकुमार॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! संसार का स्वरूप सुन। रूप, रस, गंध इन्हीं पाँच विषयों को देकर, इन्द्रियों को तृप्त करना चाहता है किन्तु रहस्य कुछ नहीं जानता। देख! तेरी कोई इच्छा पूर्ण हो जाती है तो पुनः उसके लिये पूर्ववत् प्रयत्न प्रारम्भ हो जाता है और जब तेरी इच्छा पूर्ण नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है! दोनों ही अवस्थाओं में तुझे दारुण दुःख मिलता है। समस्त कामनाओं को छोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर का भजन कर।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 157