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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 121

सुनो मन! यह वेदन को सार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! yaha vedana ko sāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो मन! यह वेदन को सार।

2कहत"रसो वै सः"यह वेदन, या पर करिय विचार।

3रसिक शिरोमणि ब्रह्म श्याम बिनु, रस न पाउ संसार।

4"उपासते पुरुषं"येहि श्रुति को, इहै अर्थ उर धार।

5सकल कामनाहीन दीन बनि, भजिये नंदकुमार।

6तब “कृपालु” तुम पाव प्रेम रस, बस गोलोक मझार॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! सब वेदों का यही निष्कर्ष है। वेद में जो रसो वै सः'कहा गया है, इस पर गंभीर विचार कर। इसका भाव यही है कि रसिक शिरोमणि ब्रह्म श्यामसुन्दर के बिना संसार में कहीं भी वास्तविक सुख नहीं है। "उपासते पुरुषम् इस श्रुति का भी यही अर्थ है कि समस्त कामनाओं से रहित होकर नंद कुमार का भजन करो। 'कृपालु' कहते हैं कि तभी उनकी कृपा से तू प्रेम रस पा सकेगा एवं पश्चात् सदा के लिये गोलोक में निवास करेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 156-157