सिद्धान्त-माधुरी · पद 120
सुनहु मन! यह ऐसो संसार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunahu mana! yaha aiso sansāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनहु मन! यह ऐसो संसार।
2बांधि अधर्मिन और विकर्मिन, पठवत नरक मझार।
3धर्मिन कर्मिन स्वर्ग पठावत, सोउ क्षणभंगुर यार।
4योगिन कहँ अणिमादि सिद्धि दै, देत छाँड़ि मझधार।
5ज्ञानिन कहँ तजि देत सदा को, दै तिन मुक्ति असार।
6प्रेम “कृपालु” पाव सोइ जोइ भज, नागर नंदकुमार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! इस मायात्मक संसार का स्वरूप सुन। यह संसार अधर्मियों एवं विकर्मियों को बाँधकर नरक भेज देता है। धर्मात्माओं एवं कर्मकाण्डियों को स्वर्ग भेज देता है किन्तु वह भी क्षणभंगुर ही है। योगियों को अणिमा, लघिमा आदि सिद्धियाँ देकर बीच में ही छोड़ देता है। ज्ञानियों को चार प्रकार की मुक्ति देकर सदा के लिए सुख एवं दुःख दोनों से वंचित कर देता है। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेम तो एक मात्र उसी को प्राप्त होता है जो श्यामसुन्दर का निरन्तर भजन करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 156