# सुनो मन! सबै श्रुतिन को सार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0133-M03-K124
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 124
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 61–61

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनो मन! सबै श्रुतिन को सार।  
<a id="line-2"></a>इक माया इक जीव दुहुँन को, ईश ब्रह्म साकार।  
<a id="line-3"></a>मायाधीन सनातन जीवहिं, माया ही सों प्यार।  
<a id="line-4"></a>जीव ब्रह्म को दिव्य अंश है, चारिहुँ वेद पुकार।  
<a id="line-5"></a>याते याको विषय न मायिक, यह मायिक संसार।  
<a id="line-6"></a>मायिक जग सों राग द्वेष तजि, रहु गुरु-शरण मझार।  
<a id="line-7"></a>तजहु “कृपालु” अपर साधन बल, भजहु युगल सरकार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! समस्त वेदों का सार सुनो। ईश्वर तीन ही तत्त्व हैं इनमें ईश्वर ही माया एवं जीव का शासक है। यह जीव अनादि काल से मायाबद्ध है और माया के क्षेत्र में ही प्यार कर रहा है किन्तु यदि यह रहस्य समझ में आ जाय कि जीव तो ईश्वर का अंश है और दिव्य है अतः मायिक जगत् इसका विषय ही नहीं है तो इस संसार से राग द्वेष रहित होकर वास्तविक महापुरुष को शरणागति में रहकर राधा-कृष्ण की भक्ति द्वारा कृतार्थ हो जायेगा। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन! अब तू सब साधनों का बल त्यागकर श्यामा-श्याम का भजन कर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 158-159

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
