सिद्धान्त-माधुरी · पद 116
सुनो मन इक अनहोनी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! ika anahonī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो मन इक अनहोनी बात।
2जग व्यापक आनंदकंद यह, लोक वेद विख्यात।
3पै यह अचरज सो नहिं काहुहिं, अनुभव माहिं लखात।
4जो चींटी चीनी के गिरि पर, करत वास दिन रात।
5सो यदि कहइ लवण गिरि ता कहँ, को यह मानि सकात।
6जो यह मरम जान चींटी मुख, लवण डली सुनु तात।
7सो “कृपालु” तजि सकल कामना, भजइ सदा बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! एक अनोखी बात सुन। यह बात लोक एवं वेद में प्रसिद्ध है कि इस संसार के परमाणु, परमाणु में आनन्द ब्रह्म व्याप्त है। किन्तु इन्द्रियादिकों से इस संसार का निरन्तर अनुभव करते हुए भी उस व्याप्त आनन्द क्रा लवलेश भी अनुभव में नहीं आता। यदि कोई चींटी चीनी के पहाड़ पर दिन-रात निवास करने पर भी यह अनुभव करे कि मैं नमक के पहाड़ पर हूँ तो यद्यपि यह आश्चर्यजनक बात होगी किन्तु यदि यह ज्ञात हो जाय कि चींरी के मुँह में नमक की डली रखी है तो कोई आश्चर्य नहीं रह जाता। सांसारिक कामनाएं नमक की डली के समान ही हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए हे मन! तू समस्त कामनाओं को छोड़कर श्यामसुन्दर का भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 153