सिद्धान्त-माधुरी · पद 117
सुनो मन! एक अनोखी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! eka anokhī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो मन! एक अनोखी बात।
2काम क्रोध मद लोभ तजहु जनि, भजहु तिनहिं दिन रात।
3काम इहै पै कब मोहिं मिलिहहिं, सुंदर श्यामल गात।
4क्रोध इहै घनश्याम-मिलन बिन, जीवन बीत्यो जात।
5रहु येहि मद मदमत्त दास हौं, स्वामी मम बलभ्रात।
6रह “कृपालु” यह लोभ छिनहिं छिन, बढ़इ प्रेम पिय नात॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! एक अनोखी बात सुन। तू काम, क्रोध मद, लोभ का परित्याग न कर वरन् इनका दिन रात का सेवन कर। किन्तु कामना यह रहे कि श्यामसुन्दर कब मिलेंगे? क्रोध यह हो कि श्यामसुन्दर के मिले बिना मानव-जीवन समाप्त हुआ जा रहा है। मद यह रहे कि मैं श्यामसुन्दर का दास हूँ एवं वे मेरे स्वामी हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि लोभ यह रहे कि श्यामसुन्दर के युगल चरणों में प्रत्येक क्षण प्रेम बढ़ता जाय।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 153-154