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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 118

सुनो मन एक काम की बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno mana! eka kāma kī bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो मन एक काम की बात।

2कोउ कह"श्याम भजन बिनु कैसेहुँ, काम न कबहूँ जात"।

3कोउ कह"काम तजे बिनु कैसेहुँ, श्याम न पाइ सकात"।

4इन दोउन भोरेन बतियन सुनि, मोहिं अचरज दरसात।

5हौं कह"करु यह काम समर्पित, श्याम चरण जलजात"।

6तब “कृपालु” इक काम इहै रह, कब मिलिहहिं बलभ्रात॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! एक काम की बात सुन। कोई कहता है कि श्यामसुन्दर के भजन के बिना इच्छाएं नहीं जा सकतीं। कोई कहता है इच्छाओं को छोड़े बिना श्यामसुन्दर का भजन नहीं हो सकता। हमारे दृष्टिकोण से ये दोनों ही भोले हैं। तथ्य यह है कि अपनी इच्छाओं को श्यामसुन्दर के चरणों में समर्पित कर दो। 'कृपालु' कहते हैं कि तब वही इच्छा इस रूप में बदलती जायगी कि श्यामसुन्दर कब मिलेंगे। इस प्रकार इच्छाओं का नाश एवं श्यामसुन्दर का भजन साथ-साथ होता जायेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 154-155