# सुनो मन इक अनहोनी बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0125-M03-K116
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 116
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 57–58

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनो मन इक अनहोनी बात।  
<a id="line-2"></a>जग व्यापक आनंदकंद यह, लोक वेद विख्यात।  
<a id="line-3"></a>पै यह अचरज सो नहिं काहुहिं, अनुभव माहिं लखात।  
<a id="line-4"></a>जो चींटी चीनी के गिरि पर, करत वास दिन रात।  
<a id="line-5"></a>सो यदि कहइ लवण गिरि ता कहँ, को यह मानि सकात।  
<a id="line-6"></a>जो यह मरम जान चींटी मुख, लवण डली सुनु तात।  
<a id="line-7"></a>सो “कृपालु” तजि सकल कामना, भजइ सदा बलभ्रात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरे मन! एक अनोखी बात सुन। यह बात लोक एवं वेद में प्रसिद्ध है कि इस संसार के परमाणु, परमाणु में आनन्द ब्रह्म व्याप्त है। किन्तु इन्द्रियादिकों से इस संसार का निरन्तर अनुभव करते हुए भी उस व्याप्त आनन्द क्रा लवलेश भी अनुभव में नहीं आता। यदि कोई चींटी चीनी के पहाड़ पर दिन-रात निवास करने पर भी यह अनुभव करे कि मैं नमक के पहाड़ पर हूँ तो यद्यपि यह आश्चर्यजनक बात होगी किन्तु यदि यह ज्ञात हो जाय कि चींरी के मुँह में नमक की डली रखी है तो कोई आश्चर्य नहीं रह जाता। सांसारिक कामनाएं नमक की डली के समान ही हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसलिए हे मन! तू समस्त कामनाओं को छोड़कर श्यामसुन्दर का भजन कर।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 153

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
