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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 115

सुने हम समदर्शी भगवान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sune hama samadarshī bhagawāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुने हम समदर्शी भगवान।

2जहँ कहुँ दीन हीन जन देखत, चोरत तन मन प्राण।

3पै तिन सों कछु पेस न पावत, जिनके उर अभिमान।

4चतुर ठगत भोरेन कहँ जगहूँ, सोचहु मनहिं सुजान।

5अभिमानिन पर करहु कृपा तब, जानउँ कृपानिधान।

6हमरे हित “कृपालु” अब सोचिय, मम अभिमान महान॥

हिन्दी भावार्थ

हे भगवान्! मैंने सुना है कि तुम समदर्शी, अर्थात् न्याय-पूर्वक सबको एक समान देखने वाले हो, पर यह बात देखने में नहीं आती। क्योंकि तुम्हें जहाँ कहीं भी कोई बेचारा साधनहीन, दीन मनुष्य मिल जाता है तो तुम उसका तन, मन प्राण सभी कुछ हरण कर लेते हो, किन्तु जिसके हृदय में अभिमान भरा रहता है उनपर तुम्हारा भी कुछ भी वश नहीं चल पाता। संसार में भी जो विशेष चतुर होते हैं वे भी तुम्हारी तरह उपर्युक्त ढंग से भोले-भाले लोगों को ठगा करते हैं। इस बात को बुद्धिमान जन अपने मन में सोच सकते हैं। अभिमानियों पर कृपा करो तब ही तो तुम कृपा निधान कहे जाओगे। कृपालु' कहते हैं कि हमारा क्या होगा? इसका विचार कीजिए क्योंकि हम तो अभिमान के भण्डार हैं अर्थात् समदर्शिता तो आपको तभी मानी जानी चाहिए जब मुझे भी आप ठग लें।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 152