# सुने हम समदर्शी भगवान।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0124-m03-k115/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0124-M03-K115
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 115
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 57–57

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0124-m03-k115/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=124&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0124-m03-k115.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुने हम समदर्शी भगवान।  
<a id="line-2"></a>जहँ कहुँ दीन हीन जन देखत, चोरत तन मन प्राण।  
<a id="line-3"></a>पै तिन सों कछु पेस न पावत, जिनके उर अभिमान।  
<a id="line-4"></a>चतुर ठगत भोरेन कहँ जगहूँ, सोचहु मनहिं सुजान।  
<a id="line-5"></a>अभिमानिन पर करहु कृपा तब, जानउँ कृपानिधान।  
<a id="line-6"></a>हमरे हित “कृपालु” अब सोचिय, मम अभिमान महान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे भगवान्! मैंने सुना है कि तुम समदर्शी, अर्थात् न्याय-पूर्वक सबको एक समान देखने वाले हो, पर यह बात देखने में नहीं आती। क्योंकि तुम्हें जहाँ कहीं भी कोई बेचारा साधनहीन, दीन मनुष्य मिल जाता है तो तुम उसका तन, मन प्राण सभी कुछ हरण कर लेते हो, किन्तु जिसके हृदय में अभिमान भरा रहता है उनपर तुम्हारा भी कुछ भी वश नहीं चल पाता। संसार में भी जो विशेष चतुर होते हैं वे भी तुम्हारी तरह उपर्युक्त ढंग से भोले-भाले लोगों को ठगा करते हैं। इस बात को बुद्धिमान जन अपने मन में सोच सकते हैं। अभिमानियों पर कृपा करो तब ही तो तुम कृपा निधान कहे जाओगे। कृपालु' कहते हैं कि हमारा क्या होगा? इसका विचार कीजिए क्योंकि हम तो अभिमान के भण्डार हैं अर्थात् समदर्शिता तो आपको तभी मानी जानी चाहिए जब मुझे भी आप ठग लें।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 152

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0123-m03-k114/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0125-m03-k116/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
