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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 114

सुन लाख टका की बात रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suna lākha ṭakā kī bāta re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुन लाख टका की बात रे।

2जो तोहिं मानत रहत आपुनो, सुत दारा पितु भ्रात रे।

3सो सब धोखा जान मूढ़ मन, है सब स्वारथ नात रे।

4जब ये जानत नहिं आपन हित, भटकत जग दिन रात रे।

5तब ये कहा करैं हित तेरो, तू इन कत पतियात रे।

6अब “कृपालु” तू तोरि नात सब, जोर नात बलभ्रात रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! लाख टका की बात सुन! भाई आदि तुझे अपना मानते रहते हैं, यह सब धोखा है। क्योंकि वे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही ऐसा करते हैं। अरे मन! जब ये लोग अपना ही वास्तविक हित नहीं समझते और सांसारिक विषयों में भरकते रहते हैं तब भला ये तेरा क्या इ हु अप म हित करेंगे। तू इन पर क्या विश्वास करता है। हैं कि अरे मन! अब तू सबसे नाता तोड़कर एकमात्र श्यामसुन्दर से नाता जोड़ ले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 151-152