सिद्धान्त-माधुरी · पद 113
सब झूठो जग व्यवहार रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: saba jhūṭho jaga vyavahāra re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सब झूठो जग व्यवहार रे।
2जब लौं तन मन धन जन सब रह, पूछत सब संसार रे।
3जब उन कहँ अभाव देखत तब, तजत सकल परिवार रे।
4जब लौं काम बनत काहू सों, जोरत नात हजार रे।
5जब ही काम बनत नहिं देखत, रहति न यारी यार रे।
6ताते भजु “कृपालु” मन छिन-छिन, नागर नंदकुमार रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! इस संसार का समस्त व्यवहार झूठा है। जब तक किसी के पास तन, मन, धन एवं सहायक जन रहते हैं तब तक उसे सब संसार पूछता है किन्तु जब इनका अभाव देखता है तब अपना परिवार भी उसे छोड़ देता है। जब तक किसी से स्वार्थ सिद्ध होता रहता है तब तक उससे हजारों नाते जोड़ता है किन्तु जैसे ही अपना काम बनते नहीं देखता बैसे ही वह मित्र भी अपनी मित्रता छोड़ देता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! इसलिए तू संसार से किसी प्रकार की आशा न रखते हुए प्रतिक्षण श्यामसुन्दर का भजन कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 150-151