सिद्धान्त-माधुरी · पद 112
संत गति मन बुधि नाहिं समात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: santa-gati, mana-budhi nāhiṁ samāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1संत गति मन बुधि नाहिं समात।
2ज्ञानी-भक्त शिरोमणि अर्जुन, अहिकन्या सों नात।
3लखत राममय जग मारुत सुत, असुरन वधत लखात।
4आत्माराम जिते सनकादिक, शाप देत बौरात।
5गुणावतार कहत विधि हरि हर, सोउ दीखत मदमात।
6सुनहु “कृपालु” योगमाया यह, संतहिं समुझि सकात॥
हिन्दी भावार्थ
महापुरुषों की अन्तरंग अवस्थाओं को मायिक मन न तो कुछ सोच सकता है, और न तो बुद्धि निर्णय ही कर सकती है। ज्ञानियों एवं भक्तों के भी सरताज अर्जुन-सरीखे महापुरुषों को भी नागकन्या में आसक्ति हो गई। समस्त संसार को हनुमान जी सियाराममय देखते हैं; फिर भी लंकादहन एवं दैत्यों का वध करते हुए दिखाई देते हैं। अपनी आत्मा में ही रमण करने वाले परमहँस सनकादिक बड़े-बड़े महात्मा क्रोध में आकर शाप देते हुए दिखाई देते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर जिनको गुणावतार कहते हैं, वे भी अभिमानयुक्त होकर कार्य करते हुए पाये जाते हैं (श्रीकृष्ण अवतार में ब्रह्मा का अभिमान)। 'कृपालु' कहते हैं कि यह लोग भगवान् की योगमाया से युक्त होकर कार्य करते हैं अतएव महापुरुषों को गति को महापुरुष ही समझ सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 150