सिद्धान्त-माधुरी · पद 111
सदा सोँ सोई दुलहिनि जाग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sadā soṁ soī dulahini jāga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सदा सोँ सोई दुलहिनि जाग।
2आये रसिक जगावन आपुहिं, जाग्यो तेरो भाग।
3भुज पसारि कब ते पिय परखत, वेगि धाइ उर लाग।
4बिनु पिय-परस न रतिरस पाइय, जरि जाइय कामाग।
5रति-रस-बस बरबस करि बस पिय, खेलु रास-रस फाग।
6अस “कृपालु” संयोग बनै जो, होवे अमर सुहाग॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! अनादि काल से मोह-निशा में सोई हुई जीव-रूपी श्रीकृष्ण- प्रेयसी, जाग जा। देख! तू कितनी बड़भागिनी र कि तुझे प्रियतम के द्वारा भेजी हुई रसिक रूपी सखि स्वयं जगाने आई है। यदि तू यह कहे कि प्रियतम के बिना, जागने से क्या लाभ होगा तो रसिक-रूपी सखी कहती है-''तुझे तो प्रियतम अनादि काल से अपनी दोनों भुजाओं को फैलाये परख रहे हैं जल्दी दौड़कर उनके हृदय से लग जा।''अगर तू कहे कि इससे क्या लाभ होगा तो सुन-बिना प्रियतम के स्पर्श के तुझे दिव्य प्रेम, रति-रस न प्राप्त हो सकेगा, तथा इसी प्रकार वासनाओं की अग्नि में जला करेगी। जब तू रति-रस पा जायेगी तब हठात् प्रियतम को अपने आधीन कर लेगी। इसके परिणामस्वरूप तु निरंतर दिव्य रास-रस की होली खेला करेगी। 'कृपालु' कहते हैं कि जब किसी जीव रूपी दुलहिन का उपरोक्त ढंग से संयोग बन जाये, अर्थात् वह रसिकों के जगाने से जाग जाय एवं उनके कथनानुसार प्रियतम के मधुर मिलन का रस पान कर ले, ते उसका अनन्तकाल के लिए सुहाग अमर हो जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 149