# सदा सोँ सोई दुलहिनि जाग।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0120-M03-K111
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 111
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 55–55

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सदा सोँ सोई दुलहिनि जाग।  
<a id="line-2"></a>आये रसिक जगावन आपुहिं, जाग्यो तेरो भाग।  
<a id="line-3"></a>भुज पसारि कब ते पिय परखत, वेगि धाइ उर लाग।  
<a id="line-4"></a>बिनु पिय-परस न रतिरस पाइय, जरि जाइय कामाग।  
<a id="line-5"></a>रति-रस-बस बरबस करि बस पिय, खेलु रास-रस फाग।  
<a id="line-6"></a>अस “कृपालु” संयोग बनै जो, होवे अमर सुहाग॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! अनादि काल से मोह-निशा में सोई हुई जीव-रूपी श्रीकृष्ण- प्रेयसी, जाग जा। देख! तू कितनी बड़भागिनी र कि तुझे प्रियतम के द्वारा भेजी हुई रसिक रूपी सखि स्वयं जगाने आई है। यदि तू यह कहे कि प्रियतम के बिना, जागने से क्या लाभ होगा तो रसिक-रूपी सखी कहती है-''तुझे तो प्रियतम अनादि काल से अपनी दोनों भुजाओं को फैलाये परख रहे हैं जल्दी दौड़कर उनके हृदय से लग जा।''अगर तू कहे कि इससे क्या लाभ होगा तो सुन-बिना प्रियतम के स्पर्श के तुझे दिव्य प्रेम, रति-रस न प्राप्त हो सकेगा, तथा इसी प्रकार वासनाओं की अग्नि में जला करेगी। जब तू रति-रस पा जायेगी तब हठात् प्रियतम को अपने आधीन कर लेगी। इसके परिणामस्वरूप तु निरंतर दिव्य रास-रस की होली खेला करेगी। 'कृपालु' कहते हैं कि जब किसी जीव रूपी दुलहिन का उपरोक्त ढंग से संयोग बन जाये, अर्थात् वह रसिकों के जगाने से जाग जाय एवं उनके कथनानुसार प्रियतम के मधुर मिलन का रस पान कर ले, ते उसका अनन्तकाल के लिए सुहाग अमर हो जायगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 149

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
