सिद्धान्त-माधुरी · पद 110
सखी सुनु प्रेम नेम दोउ भाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, prema nema dou bhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी सुनु प्रेम नेम दोउ भाय।
2यद्यपि कोउ कह प्रेमहिं बड़ कोउ, नेमहिं बड़ बतराय।
3पै जो होय नेम प्रेमहिं को, तो झगड़ो मिटि जाय।
4होत प्रेम को नेम बड़ो सखि, चहिय वाय अपनाय।
5जो न मान प्रेमहिं नेमहिं तो, कबहुँ प्रेम नहिं पाय।
6कह “कृपालु” बिनु प्रेम, नेम ते, पाय स्वर्ग पछिताय॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि सुन! प्रेम एवं नेम दोनों में परस्पर बंधुत्व है। यद्यपि कोई कहता है प्रेम ही बड़ा होता है कोई कहता है नियम ही बड़ा होता है किन्तु यदि प्रेम संबंधी ही नियम अपना लिया जाय, तो झगड़ा समाप्त हो जाय। श्यामसुन्दर संबंधी प्रेम का नियम श्रेष्ठ है क्योंकि परमानंद प्राप्ति के लक्ष्य का हल श्यामसुन्दर के प्रेम से ही सम्भव है अतएव उसे ही अपनाना चाहिए। यदि कोई प्रेम के नियम को उच्छृंखलता के कारण नहीं मानता। (जैसे नामापराध से बचना) आदि तो उसे प्रेम कथमपि प्राप्त नहीं हो सकता। 'कृपालु' कहते हैं श्यामसुन्दर के प्रेम को छोड़कर केवल नियम मात्र के पालन करने से स्वर्गलोक की ही प्राप्ति होती है, और वह नश्वर होने के कारण सर्वथा अग्राह्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 148-149