# सखी सुनु प्रेम नेम दोउ भाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0119-M03-K110
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 110
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 55–55

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी सुनु प्रेम नेम दोउ भाय।  
<a id="line-2"></a>यद्यपि कोउ कह प्रेमहिं बड़ कोउ, नेमहिं बड़ बतराय।  
<a id="line-3"></a>पै जो होय नेम प्रेमहिं को, तो झगड़ो मिटि जाय।  
<a id="line-4"></a>होत प्रेम को नेम बड़ो सखि, चहिय वाय अपनाय।  
<a id="line-5"></a>जो न मान प्रेमहिं नेमहिं तो, कबहुँ प्रेम नहिं पाय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” बिनु प्रेम, नेम ते, पाय स्वर्ग पछिताय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि सुन! प्रेम एवं नेम दोनों में परस्पर बंधुत्व है। यद्यपि कोई कहता है प्रेम ही बड़ा होता है कोई कहता है नियम ही बड़ा होता है किन्तु यदि प्रेम संबंधी ही नियम अपना लिया जाय, तो झगड़ा समाप्त हो जाय। श्यामसुन्दर संबंधी प्रेम का नियम श्रेष्ठ है क्योंकि परमानंद प्राप्ति के लक्ष्य का हल श्यामसुन्दर के प्रेम से ही सम्भव है अतएव उसे ही अपनाना चाहिए। यदि कोई प्रेम के नियम को उच्छृंखलता के कारण नहीं मानता। (जैसे नामापराध से बचना) आदि तो उसे प्रेम कथमपि प्राप्त नहीं हो सकता। 'कृपालु' कहते हैं श्यामसुन्दर के प्रेम को छोड़कर केवल नियम मात्र के पालन करने से स्वर्गलोक की ही प्राप्ति होती है, और वह नश्वर होने के कारण सर्वथा अग्राह्य है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 148-149

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
