सिद्धान्त-माधुरी · पद 109
सखी सुनु इक कौतुक की बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu ika kautuka kī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी सुनु इक कौतुक की बात।
2जाकी माया ते विधि हरि हर, नाचत नित दिन रात।
3सोइ ब्रजनारिन की तारिन पै, नाचत बलि बलि जात।
4जाके भय भयभीत होत भय, सन्मुख ह्वै न सकात।
5सोइ स्वामिनिहिं मनावन सन्मुख, जात न अति डरपात।
6नहिं “कृपालु” कछु कौतुक प्रियतम, प्रेम विवश विख्यात॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! एक आश्चर्यजनक बात सुन। जिसकी माया से ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि भी दिन रात नाचा करते हैं वही ब्रजांगनाओं की तालियों पर नाचता हुआ भूरि-भूरि बलिहार जाता है। जिसके भय से साक्षात् यमराज भी डरता है, सहसा सामने नहीं खड़ा हो सकता, वही ब्रह्म किशोरी जी को मजाने के लिए उनके सन्मुख जाने में भी अत्यन्त भयभीत होता है। कृपालु' कहते हैं कि इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि प्रियतम श्यामसुन्दर प्रेम के अधीन हैं यह विश्वविदित ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 147-148