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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 108

सखी यह कैसो है ब्रजधाम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! yaha kaiso hai brajadhāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी यह कैसो है ब्रजधाम।

2जहँ नहिं धर्म अधर्म विचारत, छके प्रेम घनश्याम।

3लोक वेद कुल कानि न मानत, मनमाने सब काम।

4गुरुजन मात पिता पति की नित, करति अवज्ञा बाम।

5हाँसी करत सबै ब्रजवासी, लै लै सुरपति नाम।

6वेद विरुद्ध रास रस खेलत, सखिन कुंज वसु-याम।

7ज्ञानी शंभु शुकादिक जेतिक, तेउ बिके बिनु दाम।

8यह “कृपालु” कछु मरम अलौकिक, जहँ मन बुधि विश्राम॥

हिन्दी भावार्थ

हे सखि! यह ब्रजधाम किस प्रकार का है? जहाँ के समस्त नर नारी पाप पुण्य का कुछ भी विचार नहीं करते एकमात्र श्यामसुन्दर के ही प्रेम में दीवाने रहते हैं। लोक, वेद एवं कुल की मर्यादाओं का थोड़ा भी पालन न करते हुए सभी उच्छुंखल हो रहे हैं। पूज्य, माता, पिता एवं पति का अपमान जहाँ की गोपियाँ सदा ही करती रहती हैं। समस्त ब्रजवासी देवराज इन्द्र का नाम लेकर उसकी हँसी उड़ाया करते हैं। वैदिक मर्यादा के विरुद्ध जहाँ गोपियां श्रीकृष्ण के साथ रास-रस खेलती हैं, फिर भी विचित्रता यह है कि बड़े से बड़े ज्ञानी भगवान् शंकर शुकदेव आदि भी बिना मूल्य के ही बिक कर इस ब्रज में दीवाने बने घूमा करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इसका रहस्य कुछ विचित्र एवं लोकातीत है, जहाँ मायिक मन एवं बुद्धि का प्रवेश नहीं है। अंतः करण की शुद्धि के बाद ही, रसिकों की कृपा द्वारा इस दिव्य रहस्य को समझा जा सकता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 146-147