सिद्धान्त-माधुरी · पद 107
सखी मोहिं समुझावहु यह बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ samujhāvahu yaha bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी मोहिं समुझावहु यह बात।
2जग महँ जानि नात पिय कतहूँ, तियहिं नात छुटि जात।
3पुनि अँखियनहूँ लखत सखिन कत, जात पियहिं जुरि नात।
4होत सौतियाडाह जगत पै, इत विपरीत लखात।
5सखि कह सुनु सखि जग निज सुख हित, प्रीति करत दिन रात।
6सखि “कृपालु” अस प्रीति करति बस, सुखी रहैं बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! मुझे एक रहस्य समझा दे। संसार में यदि किसी प्रेयसी को यह ज्ञात हो जाता है कि मेरे प्रियतम का सम्बन्ध और किसी प्रेयसी से है तो पूर्व प्रेयसी का संबंध स्वभावतः समाप्त हो जाता है। किन्तु ब्रजांगनाएँ श्रीकृष्ण की बहुवल्लभता को देखती हैं, फिर भी श्यामसुन्दर से उनका संबंध नित्य नवीन नवीन होता जाता है। संसार में सौतियाडाह निश्चित रूपेण होता है, किन्तु श्यामसुन्दर के प्रेम में तो इसका उल्टा होता है अर्थात् वह संत-प्रेयसी दिन-रात प्रयत्न करती है कि सभी हमारे प्रियतम की प्रेयसी हो जायें और सदा के लिए आनंदमय हो जायें। सखी ने उत्तर दिया-अरी सखि सुन। जब तक किसी को परमानंद प्राप्त नहीं हो जाता तब तक किसी से कोई प्रेम नहीं कर सकता क्योंकि वह स्वार्थयुक्त होता है। निमित्त ही हो सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि सखियों का प्रेम एकमात्र श्यामसुन्दर के प्रीत्यर्थ ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 145-146