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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 106

सखी मोहिं प्रीति रीति समुझाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ prīti rīti samujhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी मोहिं प्रीति रीति समुझाय।

2कहा कहूँ सखि रीति प्रीति की, कही सुनी नहिं जाय।

3जानत वाय प्रिया प्रियतम बस, और न जानि सकाय।

4जो कर तन मन प्रान समर्पन, प्रिया प्रियहिं हरषाय।

5सो तिनहिंन अनुकंपा ते सखि, जानत कछु कछु वाय।

6देनो प्रीति कामना लेनो, सुनु संक्षेप बताय।

7देनो लेनो हो “कृपालु” जहँ, सोइ व्यापार कहाय॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! मुझे प्रीति की रीति समझा दे। सखि ने उत्तर दिया! अरी सखि। प्रीति की रीति न तो शब्दों से व्यक्त की जा सकती है और न उसे सुनकर समझा ही जा सकता है। उसे तो एक मात्र राधाकृष्ण ही जानते हैं और कोई भी पढ-सुनकर नहीं समझ सकता। हाँ इतना अवश्य है कि यदि कोई राधाकृष्ण को अपना तन-मन-प्राण सर्वस्व समर्पित कर देता है तो वह उन्हीं की कृपा से प्रीति की रीति को कुछ-कुछ समझ लेता है। शब्दों में इतना ही समझा या समझाया जा सकता है कि देने-देने का नाम प्रीति है, एवं लेने-लेने का नाम कामना है। इतने में कृपालु' ने कहा-अरी सखि! एक बात और समझ ले, वह यह कि लेने-देने का नाम व्यापार है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 144-145